बामनवास के यहां तो हालत इतनी दुखद है कि
रेल की पटरी के कारण हर दिन 2-3 गौ माताएं ट्रेन से कटकर अपनी जान गंवा रही हैं।
सोचिए… गौशाला बने या न बने, अगर गौ माता ही नहीं बचेंगी तो गौशाला किसके लिए?
हम में से कुछ लोग सोच रहे होंगे—
“चलो हमारे इलाके में गौशाला बन जाए…”
लेकिन भाई, पहले यह तो समझो कि गौ माता को बचाना जरूरी है, वरना सिर्फ नाम की गौशाला रह जाएगी।
आज सबसे बड़ा दर्द यह है कि
सब जानते हैं… सब देखते हैं… फिर भी कोई आवाज नहीं उठाता।
सब गूंगे–बहरे बनकर तमाशा देख रहे हैं,
और गौ माता रोज़ अपनी जान खो रही हैं।
क्या इतनी बेरहम चुप्पी ठीक है?
क्या हमारी संवेदना इतनी कमज़ोर हो गई है?
गौ माता को बचाना हमारी सबसे पहली जिम्मेदारी है।
रेल लाइन पर सुरक्षा घेराबंदी हो, बैरिकेड लगे, समाधान निकले—
तभी जाकर हम गौशाला की भी बात कर पाएंगे।
🙏 उठो, बोलो, और आवाज बनो—वरना इतिहास भी माफ नहीं करेगा।