*गीता अध्याय 3/9*
@gitasatsang
#drhbpandey
डां.हरिवंश पाण्डेय
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गीता 3/8 मे बताया कि वेद बिहित स्वधर्म करना चाहिये।कर्म करना कर्म न करने से बेहतर है।तो प्रश्न हुआ कि कर्म करेगे तो कर्मबंधन होगा।इस पर भगवान कहते है ,नही सुनो ---
*यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ।।*
(गीता 3/9)
*कौन्तेय* (हे कुन्तीनन्दन !) *यज्ञार्थात् अन्यत्र कर्मणः*
यज्ञार्थ कर्म के अलावा सारे कर्म
*लोकोऽयं कर्मबन्धनः*
इस संसार मे कर्मबंधन होता है
*तदर्थ कर्म* उसी परमात्मा के हेतु कर्म करे
कैसे?
*मुक्तसङ्गः समाचर*
संग रहित होकर भलीभांति कर्म करे ।
हे कुन्तीनन्दन ! श्रीविष्णुके लिए अर्पित निष्काम कर्मके अलावा अन्य कर्मोंके द्वारा मनुष्यको कर्मबन्धन प्राप्त होता है। अतः तुम फलाकांक्षा से रहित होकर भगवान् विष्णुके उद्देश्यसे कर्मका भलीभाँति आचरण करो ।
*मनन-चिंतन*
यहां उपाय बताया कि कैसे कर्म करो कि कर्म बंधन न हो।
कर्म बंधन से क्या नुकसान है?
कर्मबंधन होगा तो संसार मे आवागमन लगा रहेगा।
दूसरी बात जब हम कर्म से बध जाते हैं तो हमारी क्षमता भी कम हो जाती है।
पहली बात बताई कि *तदर्थ कर्म करो*
तदर्थ कर्म क्या है?
जिस भी कर्म को हम परमात्मा का कार्य समझ करते हैं ,जनहिताय करते है तो वह कर्म "तदर्थ" कहा जाता है।
दूसरी बात बताई *मुक्तसंग* होकर कर्म करो।
ये क्या है?
Without attachment बिना संग के कार्य होने को मुक्तसंग कहा जाता है।
मुक्तसंग होगा फल की कामना से रहित होगा।
*समाचर*
भलीभाॅति करो।फल की इच्छा नही है ,तदर्थ करो ,इसका अर्थ ये नहीं कि कार्य आधे अधूरे मन से करो।नही Do it with full devotion ,treat it as your worship.
*उदाहरण (केस स्टडी)*
राम, श्याम मित्र थे।वे एक विद्यालय मे अध्यापक थे।राम कार्य को यज्ञार्थ करता।बच्चो को पढाता पूरे मन से।उनको टेस्ट देता कापी जाचता।उनके उत्तर पढता ,गलत होता तो बच्चो को सही बात बताता।सदैव कालेज समय से पहले पहुच जाता।समय से क्लास मे जाता।एक्सट्रा क्लास लेकर बच्चो को पाठ सिखाता।
इसके बिपरीत श्याम सदा देर से जाता।क्लास मे जाता ही नही और जाता भी तो इधर उधर की बात कर समय बिता देता।कापी बिना जाचे ही नंबर दे देता।
श्याम मित्र से कहता देखो मै ज्यादा मेहनत नही करता पर सेलरी तो उतनी ही मिलती है।क्या फायदा ज्यादा टेंसन लेने से।
पर राम कहता मै पढाता हूं इस कर्म को यज्ञार्थ करता हूं।सेलरी की चिंता भी नही करता।वो तो मिलेगी ही।बस मुक्त
संग होकर भगवदर्थ कर्म करता हूं।
कुछ समय बाद राम का चयन राष्ट्र के उत्तम शिक्षकों मे हो गया।राष्टूरपति ने सम्मानित किया।जबकि श्याम को लापरवाही बरतने के आरोप मे कार्यमुक्त कर दिया गया।
तो अच्छा बनो फल की चिंता न करो ,भबिष्य तो उत्तम होगा ही।
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