

# Event Details

- **Event Name**: Real story 
- **Event Start and End Date**: Thu, 15 Oct, 2026 at 12:30 pm (+05:30)
- **Event Description**: 100 साल पहले का कांड 
जनेऊ कांड
यादवों के गले में जनेऊ देख बाभनों ने कत्लेआम मचाया:87 लोग मारे गए, लड़की को निर्वस्त्र किया; यादवों ने बाभनों का छुआ खाना छोड़ दिया
लेखक: इंद्रभूषण मिश्र

चुनावी माहौल में दैनिक भास्कर लाया है बिहार के 5 बड़े 'महाकांड' की कहानियां। ऐसे महाकांड जिनका आज भी बिहार की सियासत में गहरा असर है। पहले एपिसोड में कहानी जनेऊ पहनो और जनेऊ तोड़ो आंदोलन की...

बिहार के लखीसराय से करीब 8 किलोमीटर दूर एक गांव है लाखोचक। करीब सौ साल पहले ये गांव हिंसा और खून से नहाया हुआ था। वक्त के साथ हिंसा थम गई, खून खराबा थम गया, लेकिन एक दरार पड़ गई। दरार ऊंच-नीच की, दरार जात-पात की। आगे चलकर सियासतदानों ने इस दरार को और चौड़ा कर दिया। उसे खाई में बदल दिया।

क्या हुआ था तब… दरअसल, ये कहानी है 26 मई 1925 की। शाम ढल चुकी थी। लाखोचक गांव के एक बगीचे में उत्सव सा नजारा था। हजारों की संख्या में एक खास जाति के लोग यहां जुटे थे। भीड़ नारे लगा रही थी। जयकारे लगा रही थी। ये हुजूम था ग्वालों यानी यादवों का।

सामने अग्नि जल रही थी। कुछ हवन कुंड बने थे। सैकड़ों युवा और बुजुर्ग सफेद धोती पहनकर बैठे थे। कमर से ऊपर कोई वस्त्र नहीं। अब भीड़ से निकलकर 10-15 लोगों ने सबको जनेऊ पहनाना शुरू किया।

जनेऊ यानी सफेद धागा। कोई तीन सूतों वाला जनेऊ पहनता है तो कोई 6 सूतों वाला। कहा तो ये जाता है कि ये शूचिता का प्रतीक है। पर इसे धारण करने का तथाकथित अधिकार अगड़ी जातियों को ही है।

इधर, इसी गांव के जमींदार प्रसिद्ध नारायण के घर भी भूमिहारों का जुटना शुरू हो गया था। बिहार में भूमिहार को बाभन कहा जाता है। जमींदार, प्रसिद्ध नारायण ने ऐलान कर रखा था कि यादव नहीं माने तो खून खराबा होकर ही रहेगा। हर हाल में उन्हें काबू करना ही होगा।

लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत अपनी किताब ‘बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’ में लिखते हैं- ‘लखीसराय थाने के सीनियर सब-इन्स्पेक्टर दो दिन पहले ही छुट्टी पर चले गए थे। शायद उन्हें बाभनों की योजना का पता चल गया था। उनकी जगह सब-इन्स्पेक्टर शाह अनिसुर्रहमान शाम 5.30 बजे अपने सिपाहियों के साथ लाखोचक पहुंचे और वहीं डेरा डाल दिया। खाने-पीने के लिए बोरा भर-भर के चना, गुड़ और चूड़ा का इंतजाम किया गया था।

रात में रह-रहकर हल्ला उठा कि बाभनों की भीड़ आ रही है। यादव बाहर निकलकर देखते, लेकिन दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता। रातभर ऐसा ही चलता रहा। पूरा गांव रातभर जागता रह गया। और जागे भी क्यों ना जब खून-खराबे का ऐलान हो रखा हो।

जनेऊ धारण करते यादव समुदाय के लोग। AI इमेज - Dainik Bhaskar
जनेऊ धारण करते यादव समुदाय के लोग। AI इमेज
27 मई की सुबह करीब 5 बजे फिर हल्ला हुआ। लोगों ने बाहर निकलकर देखा- उत्तर-पश्चिम दिशा से 3 हजार से ज्यादा बाभनों की भीड़ तेजी से गांव की तरफ आ रही थी। ये भीड़ लाठी, फरसा, गड़ासा, तलवार और भाले से लैस थी।

थोड़ा ठहरकर सोचिए। रामायण-महाभारत का रणक्षेत्र। युद्ध का शंखनाद हो चुका हो। घोड़े हिनहिना रहे हो। उस रोज लाखोचक गांव का नजारा भी वैसा ही था। दबंग प्रसिद्ध नारायण घोड़े पर सवार थे और उनके सबसे भरोसेमंद साथी विश्वेश्वर सिंह हाथी पर। आजू-बाजू भी घुड़सवारों की लंबी लाइन थी। घोड़ों की टाप और पदचाप का शोर यादवों को ललकार रहा था।

भीड़ के सामने पुलिस की ताकत ठीक वैसे ही थी, जैसे कोई छाता ओढ़कर तूफान को ललकार रहा हो। फिर भी पुलिस आगे बढ़ी। बाभनों को समझाने और यादवों को मनाने की भरसक कोशिश की। पर बात बनी नहीं। बाभनों की भीड़ नारा लगा रही थी- ‘यादवों की हिम्मत कैसे हो गई जनेऊ धारण करने की’…

इसी बीच प्रसिद्ध नारायण ने गरजते हुए कहा- ‘चलो टूट पड़ो। बता दो इनको कि बाभनों से टकराने का अंजाम क्या होता है।’

भीड़ तो पहले से ही बेकाबू हो गई थी। अपने नेता की हुंकार सुनकर भीड़, पुलिस पर टूट पड़ी। कई पुलिस वाले जख्मी हो गए। कुछ तो बेहोश होकर लुढ़क गए।

पुलिस पर हमला होते देख 30-40 यादव, बाभनों की तरफ दौड़े, लेकिन बाभनों की संख्या बहुत ज्यादा थी। उनके पास हथियार भी खूब थे। दोनों तरफ से मार-काट मच गई। इसी बीच भीड़ में हल्ला हुआ- ‘सब-इन्स्पेक्टर मारे गए।’ ये बात प्रसिद्ध नारायण के कानों तक पहुंच गई। उन्होंने अपने आदमियों से कहा- ‘पुलिस वाले मर गए… हम फंस जाएंगे, भाग चलो।’ यह सुनते ही बाभनों की भीड़ उत्तर की ओर भाग चली।

अब यादवों को संभलने और जख्मी पुलिस वालों को उठाकर बस्ती ले जाने का मौका मिल गया। उनका इलाज किया जाने लगा। इसी बीच खून-खराबे की खबर पाकर एस.डी.ओ. और पुलिस इन्स्पेक्टर के साथ एसपी भी लाखोचक पहुंच गए। पुलिस और गांव वालों के बीच जोर आजमाइश शुरू हो गई।

इसी बीच फिर से हल्ला उठा- ‘बाभना सब फिर आ गया।’

इस बार इनकी संख्या 5-6 हजार थी। ये तीन तरफ से आ रहे थे। हथियारों से लैस होकर। भीड़ के दायीं तरफ लाखोचक बस्ती थी और बायीं ओर बगीचा, जहां यादवों की सभा हो रही थी।

अपना जनेऊ दिखाते, लाठियां लहराते और 'जै दुर्गा' नारे लगाते बाभनों की भीड़ ने यादवों को घेर लिया। लाठी, गड़ांसे और भाले से वार-पर-वार होने लगे। एसपी और एसडीओ समझाते-बुझाते थक गए पर ना यादव पीछे हटने को तैयार हुए ना बाभन।

आखिरकार एसडीओ ने आदेश दिया- ‘गोली चलाओ।’ धायं, धायं, धांय…… पल भर में दर्जनों लोग गिर पड़े। अब बाभनों की भीड़ ने भी फायर खोल दिया। दोनों तरफ से जमकर फायरिंग हुई।

बाभनों और यादवों के बीच खूनी संघर्ष। AI इमेज - Dainik Bhaskar
बाभनों और यादवों के बीच खूनी संघर्ष। AI इमेज
लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं- एसपी अपनी रिवॉल्वर में गोलियां भर रहे थे, तो पीछे से उनके सिर पर किसी ने लाठी मार दी। वे वहीं लुढ़क गए। कुछ ही देर में लाखोचक कुरुक्षेत्र में बदल गया। घंटों तक दोनों तरफ से गोलियां बरसती रहीं। पुलिस ने कम से कम 118 राउंड गोलियां चलाईं। दर्जनों लाशें बिछ गईं।

इसी गोलीबारी में भीड़ लाशें उठाकर ले जाने लगी। उस दौर में युद्ध में ऐसा ही होता था। लोग लाशों की गिनती नहीं करने देना चाहते थे। इसलिए मृतकों का सही अंदाजा नहीं लग पाया। एक रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम 80 लोगों की जान गई थी।

उसी शाम 7 बजे के जिलाधिकारी रायबहादुर सी.सी. मुखर्जी पूरे लाव-लश्कर के साथ लाखोचक पहुंचे। नए सब-इन्स्पेक्टर जयनारायण लाल ने अगले दिन शाम जांच संभाल ली। इस मामले में 2 मुकदमे दर्ज हुए। बाभनों ने अपनी ओर से बहस के लिए पटना के नामी वकील अली इमाम को बुलाया।

1 फरवरी 1926 को पहले मामले में 36 और दूसरे मामले में 33 लोगों को दोषी करार दिया गया। कुल 9,100 रु. का जुर्माना लगा। कई आरोपियों पर एक साल के लिए कुछ बंदिशें भी लगाई गईं। विश्वेश्वर सिंह और प्रसिद्ध नारायण सिंह पर 550-550 रु. का जुर्माना लगा।

अदालत के इस फैसले का जमकर विरोध हुआ। कहा गया कि ये एक तरफा फैसला है। 4 फरवरी 1926 को गुप्तचर विभाग के डीआईजी ने कहा-, 'दुर्भाग्यपूर्ण। पुलिस पर हमला करने और एसपी की हत्या करने की खुली कोशिश के लिए सजा-सिर्फ जुर्माना। ये तो अन्याय है।’

24 फरवरी को पुलिस अफसर मिआरजे हर्स्ट ने मुख्य सचिव को चिट्ठी लिखी- 'एक भी अभियुक्त को एक मिनट के लिए भी जेल जाना नहीं पड़ा। इस फैसले से पुलिस का मनोबल टूटेगा और भविष्य में पुलिस पर ऐसे हमलों को बढ़ावा मिलेगा।’

कहा जाता है कि प्रशासन ने बाभनों को बचाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन यादवों का मनोबल नहीं टूटा। वे झुकने को तो तैयार नहीं हुए।

जनेऊ पहनने के बाद यादवों ने बेगारी करने से साफ-साफ इनकार कर दिया। कई जगह तो यादवों ने उन जमीनों पर भी कब्जा कर लिया था, जो उनसे बीस या तीस साल पहले छीन ली गई थी। 1 मार्च 1926 को यादवों ने सभा करके ऐलान कर दिया- ‘हर यादव जनेऊ धारण करेगा। कोई भी यादव किसी बाभन यहां काम करने नहीं जाएगा। हमारी औरतें उनके खेतों में काम नहीं करेंगी।’

बाभनों और यादवों के खूनी संघर्ष में मारे गए लोग। AI इमेज - Dainik Bhaskar
बाभनों और यादवों के खूनी संघर्ष में मारे गए लोग। AI इमेज
आखिर ऐसा क्या हो गया था कि यादव जनेऊ पहनने के लिए मरने-मारने पर उतर गए थे…

दरअसल, उस दौर में अंग्रेज जातियां देखकर लगान वसूलते थे। मतलब ये कि अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग रकम। अगड़ी जाति की तुलना में पिछड़ी और दलित जातियों से ज्यादा लगान लिया जाता था।

इसे ऐसे समझिए…अगर किसी गांव में एक बीघे जमीन के लिए अगड़ी जातियां चार आना लगान दे रही थीं, तो उसी गांव में पिछड़ी और दलित जातियों के लिए लागान की रकम एक रुपए थी। यादवों और पिछड़ी जाति के लोगों को ये बात चुभती थी। आखिरकार सबने मिलकर तय किया कि अब ये अन्याय और नहीं सहा जाएगा। बिगुल फूंक ही देना है।

पारंपरिक रूप से यादव समुदाय के लोग दबंग माने जाते हैं। तो आंदोलन की अगुवाई की जिम्मेदारी भी यादवों ने उठाई। यादवों ने ऐलान कर दिया कि अब से वे भी अगड़ी जाति वाले हैं। वे किसी भी मामले में बाभनों से कम नहीं हैं।

लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं- ‘यादवों ने फैसला तो कर लिया था, लेकिन अब खुद को अगड़ा साबित भी तो करना था। तब खुद को अगड़ा साबित करने का सबसे मजबूत तरीका था जनेऊ पहनना। बस यहीं से यादवों ने ठान लिया कि वे भी जनेऊ पहनेंगे।’

बिहार में एक कहावत है- 'रोम का पोप, मधेपुरा का गोप'। उन दिनों मधेपुरा यादवों का गढ़ था। यहां के यादव प्रदेश के बाकी यादवों के मुकाबले ज्यादा संपन्न थे। लिहाजा यादवों को लीड करने का जिम्मा भी यहीं के लोगों ने उठाया।

यादवों ने ऐलान किया- ब्राह्मणों के बाद हम ही श्रेष्ठ हैं, बाभनों का छुआ नहीं खाना है

1911 का साल था। मधेपुरा का एक गांव है मुरहो। बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री और मंडल आयोग वाले बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल यानी वीपी मंडल इसी गांव के थे। उनके पिता और गांव के जमींदार रासबिहारी मंडल आंदोलन के लिए यादवों को जुटा रहे थे। यादवों के लिए वे नेता थे, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में कुख्यात अपराधी।

दिसंबर महीने में यादवों ने यहां सभा की। और ऐलान किया- ‘ब्राह्मणों के बाद सबसे श्रेष्ठ जाति यादव है। वे चंद्रवंशी और यदुवंशी क्षत्रिय हैं। राजपूतों से भी पुराने क्षत्रिय। और वे अब से जनेऊ धारण करके इसे साबित भी करेंगे। यादव जाति की महिलाएं घर से बाहर काम नहीं करेंगी। गोयठा नहीं थापेंगी। यादव हल नहीं पकड़ेंगे और बाभनों का छुआ नहीं खाएंगे।’

यहां से यादवों में जनेऊ धारण कर खुद को ब्राह्मण और क्षत्रिय घोषित करने की होड़ सी मच गई।

तो यादव जनेऊ धारण कैसे करते थे….? लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं- ‘गांव भर के बच्चे-बूढ़े एक साथ सिर मुड़वाकर आग के पास बैठ जाते थे। फिर गले में काछी के जैसा जनेऊ पहनते थे। दो दिनों तक गांव के स्त्री-पुरुष अलग रहते थे। फिर एक साथ भात खाकर वे अपने-अपने घर लौटते थे। इस तरह उनका जनेऊ संस्कार होता था।

यादवों के बाद कोइर, कुर्मी और कुशवाहा जातियां भी जनेऊ धारण करने लगीं। इसको लेकर सिर्फ हिंदुओं की अगड़ी जातियां ही नहीं मुस्लिम जमींदार भी तमतमा गए थे। तंज के अंदाज में मुस्लिम जमींदार कहते थे- ‘जबसे जनेऊ लेकर छत्री हुआ है, तब से चर्बी चढ़ गई है ह@#@#$ कोइरी लोगों को।’

लाखोचक की घटना के बाद यादवों और पिछड़ी जातियों में जनेऊ पहनने की होड़ मच गई थी। AI इमेज - Dainik Bhaskar
लाखोचक की घटना के बाद यादवों और पिछड़ी जातियों में जनेऊ पहनने की होड़ मच गई थी। AI इमेज
1912 आते-आते इसने एक व्यापक जनआंदोलन का रूप धारण कर लिया। इसी साल सितंबर में सारण जिले में एक कुर्मी की मौत पर उसके रिश्तेदार, ब्राह्मणों और हजामों से उसका क्रिया-कर्म करवा रहे थे, तब स्थानीय जमींदार ने ब्राह्मणों और हजामों को ऐसा करने से सिर्फ इसीलिए रोक दिया कि मरने वाले ने जनेऊ धारण कर रखा था।

1913 में दरभंगा में जमींदारों ने 'छत्री' बनने वाले यादवों को मारा-पीटा और उन पर फर्जी मुकदमा भी दायर करवा दिया। कई जगह यादवों का सामाजिक बहिष्कार किया गया। उनकी जमीनें छीन ली गईं।

पुरोहितों से कहा गया कि वे यादवों के धार्मिक क्रियाकलापों में, शादी-ब्याह में भाग न लें। हरिजनों को उनके मरे मवेशियों को दफनाने से मना कर दिया गया। हजामों को उनकी दाढ़ी न बनाने, कुम्हारों को उन्हें बर्तन न देने, धोबियों को उनका कपड़ा न धोने की कड़ी हिदायत दी गई। मतलब पूरा-पूरा बहिष्कार का फरमान।

इन प्रतिबंधों के बाद भी यादव रुके नहीं। पटना और मुजफ्फरपुर में यादवों ने सभा की और ऐलान किया कि अब से वे हर काम खुद करेंगे। यानी वे अपनी दुकान चलाएंगे। बाल काटेंगे और खुद ही धार्मिक क्रियाकलाप भी करेंगे। और खुद ही जानवरों के मरने पर उन्हें हटाएंगे भी। कई जगहों पर यादवों ने बिना पुरोहित बुलाए ही खुद ही जनेऊ धारण कर लिया। धीरे-धीरे बिहार के अलग-अलग हिस्सों में यादव ऐसा करने लगे। मतलब एक आंदोलन चल पड़ा।

बाभनों ने यादवों से लड़ने के लिए 300 मल्लाहों को पैसे देकर बुलाया

लेखक प्रसन्न चौधरी और पत्रकार श्रीकांत लिखते हैं- ‘ग्वालों के गले जनेऊ देख-देखकर जले-भुने बाभनों के एक गिरोह ने एक ग्वाला लड़की के साथ दुर्व्यवहार किया और फिर उसे नंगा छोड़ दिया। लड़की ने समस्तीपुर के एसडीओ के सामने अपना दुखड़ा रोया और शिकायत दर्ज की। लेकिन बिना जांच के उसकी शिकायत खारिज कर दी गई। नाराज ग्वालों ने पंचायत बुलाने का फैसला किया।

इसी बीच बाभनों ने अपने ही घरों में आग लगा ली ताकि ग्वालों को झूठे मुकदमे में फंसाया जा सके।

जब ग्वालों की पंचायत में यह खबर पहुंची तो वे भड़क उठे। एक बाभन का आम का बगीचा लूट लिया गया और एक दूसरे बाभन की पिटाई कर दी। इसके बाद यादवों की भीड़ ने बाभनों के घरों को चारों ओर से घेर लिया।

अब बाभनों ने 300 मल्लाहों को अपने पक्ष में लड़ने के लिए तैयार किया। वो भी पैसे देकर। कुछ देर में बाभन हमला करने ही वाले थे कि पुलिस ने दखल देकर मामला शांत करा दिया। खून-खराबा होने से रह गया।

बाभनों की तरफ से यादवों पर हमला करने के लिए जुटे मल्लाहों की भीड़। AI इमेज - Dainik Bhaskar
बाभनों की तरफ से यादवों पर हमला करने के लिए जुटे मल्लाहों की भीड़। AI इमेज
इस तरह यादवों के जनेऊ धारण करने पर बाभन लगातार उनका विरोध करते रहे। कई बार उनके साथ मार-पीट हुई। आगे चलकर यही जंग 1925 में लाखोचक पहुंच गई। यादवों और बाभनों के खूनी संघर्ष की कहानी हम ऊपर बता ही चुके हैं। तो अब आगे की बात…

लाखोचक जनेऊ आंदोलन के बाद पिछड़े समूह की दबंग जातियां एक जुट हो गईं, लेकिन ये एकजुटता सिर्फ सामाजिक या आर्थिक नहीं रही। बहुत जल्द इसमें सियासत भर दी गई। 1933 आते-आते इस एकजुटता ने अपना सियासी संगठन भी बना लिया।

तारीख थी 30 मई 1933, बिहार के रोहतास जिले में एक गांव है करगहर। जनसुराज वाले प्रशांत किशोर इसी गांव से आते हैं। तब ये गांव शाहाबाद जिले का हिस्सा था। जगदेव सिंह यादव, यदुनंदन प्रसाद कुशवाहा और शिवपूजन कुर्मी ने मिलकर तीन जातियों का एक संगठन बनाया। नाम रखा ‘त्रिवेणी संघ’। इसमें तीन जातियां शामिल थीं- यादव, कोइरी और कुर्मी। संगठन का मोटो लाइन था- ‘संघ शक्ति कलीयुगे।’ यानी कलयुग में संगठन ही शक्ति है।

जगदेव, यदुनंदन और शिवपूजन, तीनों पहले कांग्रेस के नेता थे। 1937 में यह संगठन चुनाव में उतर गया, लेकिन एक भी उम्मीदवार जीत नहीं सका। हालांकि, इससे पिछड़ी जातियां जाग जरूर गईं। उन्हें लगने लगा कि वे भी राजनीति कर सकते हैं। अब इसमें दूसरी पिछड़ी जातियां और दलित भी जुड़ गए। 1939 में संगठन ने जिला बोर्ड के चुनाव में अपने 21 उम्मीदवार उतार दिए। इनमें से 5 जीत भी गए। ठीक-ठाक वोट भी मिल गए।

तब चौकीदारों में दुसाध समुदाय के लोगों की अच्छी खासी पैठ थी। इस तरह त्रिवेणी संघ को गांव-गांव में अपना प्रचारक मिल गया।

आगे चलकर इस संगठन के प्रभाव के चलते कांग्रेस को अपने संघठन में फेरबदल किए और पिछड़ी जातियों को भी शामिल करना पड़ा। 1945-46 के चुनावों में कांग्रेस ने पिछड़ी जातियों को भी टिकट दिया। यानी अब संदेश साफ था कि पिछड़ी जातियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

उन दिनों त्रिवेणी संघ को लेकर कविता गाई जाती थी…

 - Dainik Bhaskar
आजादी के बाद धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों की पैठ मजबूत होने लगी। सियासी गलियारों में भी उनकी दखल बढ़ी। आरक्षण और जातिगत आंदोलनों के बाद सवर्णों को लगने लगा कि जनेऊ धारण करने से बहुत कुछ हासिल नहीं होने वाला। उल्टे उनकी जातिगत सियासत में जनेऊ रोड़ा ही बन रहा था।

जब लोग जनेऊ तोड़-तोड़कर जेपी को दान करने लगे

साल था 1974 और तारीख 6 सितंबर। जगह सारण जिले का सिताब दियारा। यानी जय प्रकाश नारायण का गांव। एक पीपल के पेड़ के नीचे 10 हजार से ज्यादा लोग कुर्ता उतारे खड़े थे। अचानक एक लड़का सामने आया। ऊंचाई वाली जगह पर खड़ा हो गया। मंच से नारा लगाया- ‘हम जाति नहीं मानेंगे।’ और अपने दोनों हाथ से जनेऊ पकड़ा और पट-पट करके तोड़ दिया।

भीड़ भी नारा लगाने लगी- ‘हम जाति नहीं मानेंगे।’ इसके बाद एक एक दो नहीं करीब 10 हजार लोगों ने अपना जनेऊ तोड़ दिया। यहां से बिहार में जनेऊ तोड़ो आंदोलन की नींव पड़ गई। जगह-जगह लोग जनेऊ तोड़ने लगे। ऐसा करने वालों में युवा सबसे ज्यादा थे।

जेपी आंदोलन के दौरान जनेऊ तोड़ने की मुहिम शुरू हुई थी। AI इमेज - Dainik Bhaskar
जेपी आंदोलन के दौरान जनेऊ तोड़ने की मुहिम शुरू हुई थी। AI इमेज
इससे जुड़ा एक और किस्सा है। तारीख थी 24 अक्टूबर और साल 1974, जेपी ट्रेन में बैठकर कटिहार से पटना लौट रहे थे। ट्रेन बेगूसराय रेलवे स्टेशन पर रुकी। हजारों छात्र स्टेशन पर खड़े होकर नारे लगा रहे थे। जेपी ट्रेन से उतरे। इसी बीच एक पंडित वहां पहुंच गए। वे जेपी को प्रेम से धोती और जनेऊ भेंट में देने लगे। जेपी ने जैसे ही जनेऊ देखा, बोल पड़े- ‘मैं तो शूद्र हूं, जनेऊ कैसे पहनूं?’

जेपी ने छात्रों की ओर देखा और कहा- ‘जनेऊ जातिगत श्रेष्ठता का प्रतीक है। समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव करने वाले इस बंधन को तोड़ डालो।’ देखते ही देखते स्टेशन पर मौजूद छात्रों ने अपने-अपने जनेऊ तोड़ डाले। जनेऊ का ढेर लग गया। इसके बाद तो ऐसा हो गया कि जेपी जहां भी जाते, वहां हर सभा में छात्र जनेऊ तोड़ने लगते।

जनेऊ तोड़ो आंदोलन से जेपी आंदोलन को और मजबूती मिली। आगे चलकर इसी आंदोलन ने केंद्र और बिहार से इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंका। 80 के दशक के बाद बिहार में पिछड़ी जाति के नेताओं का उभार हुआ।

लालू, नीतीश और रामविलास जैसे नेता सियासत के सिरमौर बन गए। जातिगत पार्टियां बन गईं। बाद में इस आंदोलन ने ‘मंडल बनाम कमंडल’ की बहस को और गहरा कर दिया। 1990 के दशक के बाद बिहार में कभी सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बना।

नोट : यह सच्ची कहानी अलग-अलग किताबें, अखबार और इंटरनेशनल रिपोर्ट्स पर आधारित है। क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करते हुए इसे कहानी के रूप में लिखा गया है।)
- **Event URL**: https://allevents.in/patna/real-story/200030133878240
- **Event Categories**: 
- **Interested Audience**: 
  - total_interested_count: 109

## Ticket Details


## Event venue details

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- **state**: BR
- **country**: India
- **location**: Adalatganj
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- **long**: 85.12942637463
- **full address**: Adalatganj, Patna, India

## Event gallery

- **Alt text**: Real story
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## FAQs

- **Q**: When and where is Real story  being held?
  - **A:** Real story  takes place on Thu, 15 Oct, 2026 at 12:30 pm to Thu, 15 Oct, 2026 at 12:30 pm at Adalatganj, Patna, India.
- **Q**: Who is organizing Real story ?
  - **A:** Real story  is organized by VK TALKS By Vikash.

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