*चिंतन*
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डाॅ.हरिवंश पाण्डेय
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4/22 मे बताया कि कौन कर्म बंधन मुक्त है।अब 4/23 मे ऐसे साधकों के बिशेषण बताया है जिसके सारे कर्म बिलीन हो जाते हैं-
*गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।*
*यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥*
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं।
पहला बिशेषण है- *गतसंगस्य* - सर्वतो निवृत्तासक्ते: -भाव है,जिसकी सब ओर से आसक्ति निवृत्त हो चुकी हो।
*मुक्तस्य* - निवृत्तधर्माधर्मादिबन्धनस्य-जिसके पुण्य-पाप रूप बंधन छूट गये हैं।
*ज्ञानावस्थितचेतसः*- ज्ञाने एव अवस्थितं चित्त:यस्य - जिसका चित्त सदैव ज्ञान मे स्थित है,
*यज्ञायाचरतः कर्म*-केवल यज्ञ संपादन हेतु कर्मो का आचरण करने वाले का,
*समग्रं*-सारे कर्म
*प्रविलीयते*- बिलीन हो जाते हैं।
भाव है जो साधक ऐसा होगा, उसके सारे कर्म और उनके फल भी नष्ट हो जाते है।
तो न पाप रहा न पुण्य, फिर तो मुक्त ही हो गया।
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